मस्तिष्क हृदय व शरीर को स्वस्थ कैसे बनाएं

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हम अदिति के अधिष्ठान बनें। मस्तिष्क हृदय व शरीर को स्वस्थ बनाएं । सब लोगों में ज्ञान का प्रसार करने वाले बनें। यही मार्ग है वरुण बनने का व प्रभु को प्राप्त करने का।

हमें अपने हृदय में कर्म संकल्प धारण करना चाहिए ।कर्म संकल्प शून्य हृदय ऐसा होता है जैसा कि दूध रहित गाय, यज्ञ अग्नि से रहित गृहस्थ ,  सूर्य से  शून्य ये लोक और औषधियों से शून्य पर्वत ।

प्रभु ही सूर्य आदि देवों के प्रकाशक हैं। सूक्ष्म दृष्टि वाला पुरुष ही प्रभु के दर्शन कर सकता है।  अतः आइए जानते हैं प्रभु की उपासना करने वाले कैसे होते हैं ?

ये ज्ञान की रश्मियों वाले होते हैं । नैतिक स्वाध्याय के कारण इनकी ज्ञान अग्नि सदा प्रकाशित रहती है । गृहस्थ के बोझ को उठाने में यह सदा समर्थ होते हैं । प्रभु की उपासना इन्हें शक्ति देती है और यह गृहस्थ के कार्यभार का सुंदरता से वहन करते हुए घर को स्वर्ग बनाने का यत्न करते हैं । ये संसार यात्रा में आने वाले विघ्नों से घबराते नहीं।  कितने भी विघ्न आएं ये रोने धोने नहीं लगते अपितु अपने उत्साह को स्थिर रखते हुए यह आगे बढ़ते हैं।  भाग्य का रोना नहीं रोने बैठ जाते।  अपने घर में भी यज्ञ अग्नि को कभी नहीं बुझने देते । यज्ञ अग्नि को बुझने देने वाला  'वीरहा' होत है । ये का अवीरहा बनते हैं । यह वेद से प्रेरणा लेने वाले बनते हैं । श्रुति को परम प्रमाण मानते हुए अपने जीवन यात्रा के लिए वहीं से प्रेरणा प्राप्त करते हैं।

इन गुणों से युक्त पति पत्नी गृहस्थ में प्रवेश करेंगे तो उनका कल्याण अवश्य होगा।  अतः हमारा घर ऐसा बने जहां यज्ञ करना प्रत्येक व्यक्ति के लिए स्वभाविक बन जाए । जिसके बिना इस घर के लोग रह ही ना सकते हों ।

प्रभु से प्रार्थना:-

ऐसे यजमान यज्ञशील के घर में पति-पत्नी प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि मेरे लिए आप कल्याणकारी, सुख को देने वाले हो।  आप इहलौकिक दृष्टिकोण से मेरे जीवन को सुखी बनाते हो तो पारलौकिक दृष्टिकोण से भी आप ही मेरा कल्याण करते हो ।   हे सब  के रक्षक अथवा ज्ञान के स्वामी प्रभु ! सब यज्ञों को मुझे प्राप्त कराइए आपकी कृपा से मैं ज्ञान की दीप्तीयों को प्राप्त करूं और शक्तिशाली बनूं । हे प्रभु ! इधर-उधर घूम कर ढूंढने वाले लोग आपको प्राप्त ना करें । इसी प्रकार यागादि उत्तम कर्मों में विघ्न डालने वाले लोग भी आपको प्राप्त न कर सकें।  और लेने ही  लेने  वाले, जिन्होंने देना ना सीखा हो ऐसे लोग जो दूसरों का बुरा करने वाले अथवा कामनावाले लोग आपको प्राप्त मत हों।  दूसरे शब्दों में मैं इन जैसा कभी ना बनूं।  मैं  इन सब वृत्तियों से ऊपर उठ  आपको पाने वाला बनूं।  हे प्रभु ! आप शीघ्र गामी होकर सुदूर स्थान से भी मुझे प्राप्त हों।   वस्तुतः मैं स्वयं क्रियाशील बनूंगा तभी आपको प्राप्त कर पाऊंगा।  हे प्रभु!  मुझे यज्ञशील के घर  प्राप्त हो , मैं गतिशील बनूं  मेरे गति यज्ञों में परिणित हुई है । यजुर्वेद के प्रारंभ में आपने यही प्रेरणा दी थी कि तुम गतिशील हो , सदा उत्तम कर्मों में प्रेरित होते रहो।  हमारा घर संस्कृत  है, शुद्ध बनाया गया है । हमने इसे इसे इसीलिए तो पवित्र बनाने का प्रयत्न किया है कि हम आपको प्राप्त कर सकें। इस घर में हम आपका आतिथ्य कर पाएं। हे प्रभु ! आप हमारे मार्गदर्शक बन हमारे हृदय में सदा विराजमान हों।
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