मनुष्य की प्राथमिकता धन प्राप्त करना होता है और इसीलिए सुबह से शाम तक वह व्यस्त रहता है परंतु कहीं ना कहीं किसी न किसी मोड़ पर वह भी शांति , संतुष्टि चाहता है । शांति की प्राप्ति के लिए वह कभी पहाड़ों पर घूमने जाता है , कभी फ्रेंड्स के साथ समुद्र किनारे जाता है और कभी सुबह शाम अकेले में सैर करते हुए उस शांति को खोजने का प्रयास करता है।
वास्तव में शांत मन से ही सभी समस्याओं का हल निकाला जा सकता है इसीलिए जब कभी कोई मुसीबत आती है तो उस समय मनुष्य शांत और अकेले रहना चाहता है ताकि आत्मनिरिक्षण से उस समस्या का हल निकाल सके । इस बात का प्रमाण वैसे तो हमें बहुतायत देखने को मिलता है परंतु पैब्लो नेरुडा की कीपिंग वाइट पोयम के माध्यम से हम इसे बहुत अच्छी तरह से समझ सकते हैं।
इस कविता में कवि चाहता है कि जब तक वह 12 गिने , हम सब शांत रहे । 12 , समय के सूचक के तौर पर लिया गया है अर्थात 12 घंटे और 12 महीनों में से कुछ पल आत्म निरिक्षण के लिए निकालने चाहियें । वह चाहते हैं कि उस समय संसार के किसी भी भाषा में बातचीत ना करें और अपनी भुजाओं को हिलाना बंद कर दे अर्थात ना तो हम उस समय किसी भी काम में व्यस्त हों और ना ही कोई भी हथियार उस समय उठाया जाए ।
कवि की कल्पना के अनुसार अगर ऐसा होता है तो यह एक बहुत ही मनमोहक क्षण होगा । हम सब मिलकर उस तत्कालिक विचित्र पल का आनंद लेंगे। और तो और ऐसा करने से मछुआरे ध्रुव क्षेत्रों के ठंडे समुद्र में व्हेल मछलियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाएंगे
तथा वह आदमी भी जो अपने हाथों से नमक इकट्ठा करता है ,अपने घायल हाथों का अवश्य ध्यान रखेंगे ।
अर्थात हम भौतिक संसाधनों के लालच में नहीं पड़ेंगे और न ही किसी को नुकसान पहुंचायेंगे। आत्मनिरिक्षण करने से हम युद्धों को रोक भी सकते हैं जैसे पर्यावरण के विरुद्ध, जहरीली गैसों के साथ युद्ध, अग्नि शस्त्रों का प्रयोग इत्यादि । इन युद्धों में विजय अर्थहीन है क्योंकि युद्धों के बाद विजयोत्सव मनाने वाला कोई भी जीवित नहीं रहता । चारों तरफ शोक और अशांति होती है। युद्ध लड़ने की बजाय सैनिकों को अपने सबसे बढ़िया कपड़े पहन कर बाहर निकलना चाहिए और अपने दूसरे भाइयों के साथ छायादार वृक्षों के नीचे सैर पर निकल जाना चाहिए । उन्हें कुछ न करने का आनंद लेना चाहिए और भ्रातृत्व की भावना को बढ़ाना चाहिए।
कवि यह भी नहीं चाहता कि हम निश्चलता को पूर्ण निष्क्रियता समझने की भूल करें । पूर्ण निष्क्रियता मौत होने पर ही होती है परंतु कवि के अनुसार निश्चलता और मृत्यु का कोई भी संबंध नहीं है । हमें सदा चलते ही रहना चाहिए थोड़ी देर आराम करने के बाद फिर से हम अपने आप को व्यस्त कर सकते हैं । एक लंबी चुप्पी हमारा बहुत ज्यादा फायदा कर सकती है । आदमी स्वयं को समझने में असफल है इसीलिए वह निराश हो जाता है । जब वह स्वयं को मौत से डराना शुरू कर देता हैं तो वह असहाय अनुभव करता है । एक लंबी चुप्पी हमारी भावनाओं को शांत कर सकती है और इस उदासी को हटाने में हमारी सहायता कर सकती है ।
कवि हमें याद दिलाना चाहता है कि निश्चलता का अर्थ पूर्ण निष्क्रियता नहीं होता अपितु कुछ देर आराम करने के बाद दोगुने उत्साह से काम करना होता है । हम पृथ्वी से शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं कि जब हर चीज मृतप्राय प्रतीत होती है जैसे सर्दीयों और प्राकृतिक आपदा के समय में सब कुछ मृतप्राय प्रतीत होता है परंतु कुछ ही समय बाद मौसम में बदलाव के साथ ही पृथ्वी भी सजीव हो जाती है
सभी ओर डबल स्पीड के साथ काम शुरू हो जाता है । इसीलिए हमें भी कुछ देर तक शांत रहना चाहिए , आत्म निरीक्षण करना चाहिए ताकि हम अच्छाइयों को बढ़ा सकें और बुराइयों को खत्म कर सके । अतः आत्मनिरिक्षण से ही सभी समस्याओं को सुलझाने का प्रयास किया जा सकता है ।
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