भारतीय दार्शनिक तथा आध्यात्मिक चिंतन में वेदों के पश्चात उपनिषदों को ही सर्वोपरि महत्व स्थान प्राप्त है उपनिषद ही ऐसे ग्रंथ है जिनमें अध्यात्मिक ज्ञान का सुचारू विवेचन उपलब्ध होता है। इन ग्रंथों में परमात्मा शक्ति, जीवात्मा सृष्टि प्रपंच की जैसी मनोज्ञ तथा सटीक व्याख्या की गई है वैसे संसार के किसी अन्य साहित्य में दुर्लभ है
। उपनिषदों में वर्णित कहानी के माध्यम से ही हम जानने का प्रयास करेंगे ," सबसे बड़ा कौन?"अर्थात मानव शरीर में सबसे श्रेष्ठ शक्ति कौन सी है?एक बार शरीर की सभी इंद्रियों में इस बात को लेकर विवाद हो गया कि उनमें से कौन बड़ी है, कौन श्रेष्ठ है ? एक दूसरे से स्वयं को बढ़ा चढ़ा कर बताने का उनका प्रयास चलता रहा । इंद्रियों के अतिरिक्त प्राण का भी इस विवाद में हिस्सा था । ये सभी इंद्रियां और प्राण इस विवाद का निपटारा कराने के लिए प्रजापति के पास पहुंचे और बोले आप इस बात का फैसला करें कि हम इंद्रियों और प्राण में सर्वश्रेष्ठ कौन है ?? प्रजापति ने कहा तुम में से जिसके शरीर से निकल जाने पर यह शरीर निष्क्रिय हो जाता है अर्थात मृत्त हो जाता है उसे ही श्रेष्ठ मानना पड़ेगा।
यह सुनकर सर्वप्रथम वाणी शरीर से निकल गई अर्थात वाणी ने शरीर को त्याग दिया वह वर्ष भर बाहर रहकर पुनः लौट कर आई और शेष इंद्रियों से पूछा:- तुम मेरे बिना कैसे जीवित रहे? उत्तर में इंद्रियों ने कहा जिस प्रकार गूंगा आदमी वाक् शक्ति के बिना भी जीवन धारण करता है जीवित रहता है उसी प्रकार हम भी तुम्हारे अभाव में रहे। यह शरीर नाक से सांस लेता रहा, आंख से देखता रहा, कानों से सुनता रहा, मन से विचार करता रहा । इसके सभी कार्यक्रम चलते रहे मात्र बोलने की ही शक्ति नहीं थी। अब वाणी को इस बात का पता चल गया था कि मेरे बिना शरीर जीवित रह सकता है इसका मतलब मैं श्रेष्ठ नहीं हूं ।
इसके बाद नेत्र - शक्ति शरीर से चली गई और वर्ष भर बाहर रहकर पुनः लौटी तो उसे भी यही बताया कि नेत्रों के अभाव में एक अंधे के तुल्य इस शरीर का सब काम काज ऐसे ही चलता रहा
। प्राण से श्वास प्रक्रिया, सुनने की शक्ति, वाणी, मन सभी अपने-अपने काम करते रहे । अतः शरीर को कोई विशेष कठिनाई नहीं हुई । अब नेत्रों को भी बात समझ में आ गई कि मैं श्रेष्ठ नहीं हूं ।
अब मन वर्षभर के लिए शरीर से अलग हो गया तथा शरीर के चलने-फिरने में कोई कठिनाई नहीं हुई इतना अवश्य हुआ कि इस बीच विचार शक्ति संकल्प - विकल्प आदि मानसिक क्रियाएं खत्म हो गईं वैसे भी दुनिया में बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो मानसिक बीमारियों से ग्रस्त होते हैं फिर भी वे जीवित रहते हैं ।
अब सबसे अंत में प्राण शरीर से निकलने लगे अब तो शरीर की स्थिति वैसी हो गई जैसे किसी खूंटे से बंधे घोड़े को आप अगर डंडा मारे तो वह क्या करेगा..... इधर खूंटे से बंधा होने के कारण वह वहां से भाग नहीं सकता परंतु डंडे की ताड़ना भी उसके लिए बहुत पीड़ादायक है अतः वह अपनी संपूर्ण शक्ति से उस खूंटे को ही उखाड़ने का प्रयत्न करेगा । यही स्थिति शरीर की सभी इंद्रियों की हुई प्राण के शरीर से निकलते ही नाक, कान, आंख, वाणी सभी इंद्रियां अपना स्थान छोड़कर बाहर जाने लगी और शरीर के मृत अवस्था में पहुंचने की स्थिति उत्पन्न हो गई। इस प्रकार शरीर की स्थिति के लिए प्राणों को ही श्रेष्ठतम माना गया और प्राण ही सबसे श्रेष्ठ माने गए । अब सभी इंद्रियां प्राण के निकट आकर कहने लगी तुम हम सब में श्रेष्ठ हो , तुम हमारे स्वामी हो , तुम इस शरीर से मत निकलो । तो इससे सिद्ध हुआ कि शरीर में प्राण शक्ति ही जीवन का आधार है ।
आगे वाणी कहती है कि उसकी महिमा का उल्लेख करते हुए लोग कहते हैं ," तू वसिष्ठ है किंतु वास्तव में तो तुम वसिष्ठ है वसिष्ठ का अर्थ है अच्छी धन शक्ति । पुनः आंख ने कहा लोग मुझे प्रतिष्ठा कहते हैं किंतु हम सब की प्रतिष्ठा का कारण तो तुम हो । कान ने कहा मुझे संपदा कहते हैं किंतु वास्तविक संपदा तो हे प्राण तुम ही हो । अंत में मन ने कहा मैं आश्रय कहलाता हूं किंतु इस शरीर का वास्तविक आश्रय तो तुम हो । निष्कर्ष रूप में यदि प्राण ना हो तो वाणी, नेत्र, कान, मन आदि का अस्तित्व है प्राणों के रहने से ही इनकी भी उपस्थिति है । प्राण के न रहने पर यह गोलक मात्र रह जाते हैं मृत शरीर में भी नेत्रों के स्थूल गोलक तो रहते हैं किंतु उनमें दर्शन शक्ति नहीं जीवित रहती । वाणी तो होती है परंतु प्राण रहित शरीर बोलता नहीं । कान तो होता है परंतु सुनता नहीं । नासिका तो होती है परंतु स्वसन क्रिया नहीं होती ।अतः शरीर का आधार प्राण है प्राण शक्ति के अभाव में वृक्ष भी सूख जाते हैं किंतु प्राणों की विद्यमानता में एक बार सुख कर भी पुनः हरे भरे हो जाते हैं । इसीलिए हमें अपनी प्राण शक्ति को बढ़ाने का उपाय करते रहना चाहिए अर्थात हमारा खान-पान , हमारा रहना , सब ऐसा हो जिससे हमारी प्राणशक्ति बढ़े । इसके लिए हमें ऋतु के अनुसार और कम मात्रा में भोजन करना चाहिए । साथ ही साथ हमें योग, प्राणायाम और आसन इत्यादि भी करने चाहिए । आयुर्वेद एवं प्राकृतिक चिकित्सा को दैनिक जीवन-शैली में अपनाना चाहिए । आज के इस आधुनिक दौर में हम इस बात को बड़ी अच्छी प्रकार से समझ सकते हैं । कोरोनावायरस का जो प्रहार हमारे ऊपर हुआ है उसमें वही बच पाया है जिसके प्राण शक्ति मजबूत थी, जिसकी प्राण शक्ति कमजोर थी वह कोरोना के इस कहर को झेल नहीं पाया । अतः अपनी प्राचीन परंपराओं पर गर्व करते हुए , वैदिक विचारधारा को अपनाते हुए , अपनी प्राण शक्ति को बढ़ाइये और हमारे पूर्वजों द्वारा स्थापित परंपराओं का विश्व में प्रचलित कीजिए ।
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