शिक्षक दिवस

सुंदर सुर सजाने को साथ सजाते हैं,
नौसखिये परिंदे को बाज बनाते हैंं,
ऐसे शिक्षकों को हम बार बार शीश झुकाते हैं।


शिक्षक दिवस को पूरे संसार में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है भारतीय परंपरा के अनुसार जुलाई में गुरु पूर्णिमा के नाम से इसे मनाया जाता है और  कैलेंडर के हिसाब से  5 सितंबर को डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस के अवसर पर शिक्षक दिवस मनाया जाता है । और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 5 अक्टूबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है । यह एक दिन सिर्फ शिक्षकों को समर्पित करके हम शिक्षकों के प्रति अपना ऋण तो नहीं चुका सकते परंतु इस दिन उनके प्रति अपना प्यार , समर्पण जताकर उनकी महिमा का बखान अवश्य कर सकते हैं । आने वाली पीढ़ी को प्रेरित कर सकते हैं कि गुरु का स्थान  बहुत महत्वपूर्ण होता है ।उनके बिना हम जीवन में कुछ भी सीख नहीं पाते  । जैसे जैसे हम बड़े होते हैं अपने आसपास की सभी चीजों से, प्रकृति से माता-पिता से, समाज से हम बहुत कुछ सीखते हैं  परंतु गुरु से जो शिक्षा मिलती है वह हमें उच्च स्तर पर ले जाती है । गुरु की महिमा का बखान हम 1 दिन में नहीं कर सकते।  गुरु का स्तर इतना ऊंचा है कि उनकी तुलना किसी ओर से भी नहीं कर सकते। 

गुरु न सिर्फ आपके लक्ष्य को निर्धारित करने में आपकी सहायता करता है अपितु उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, जो इच्छा शक्ति चाहिए होती है , उसको भी जागृत  करता है ।  श्री राम को विश्वामित्र जैसे गुरु मिले तो श्रीराम सबसे उत्तम राजा बने , आज भी हम उन्हीं के जैसे राज्य की कल्पना करते हैं । श्रीकृष्ण ने भी गुरूकुल   में शिक्षा ली और उनके जैसा योगेश्वर , विद्वान, कूटनीतिज्ञ, योद्धा, हमें कहीं भी देखने को नहीं मिलता ।  महाराणा प्रताप भी गुरुकुल में पढ़ें और हर क्षेत्र में महान रहे । प्राचीन समय की अगर बात करें तो गुरुकुल शिक्षा को महत्व दिया जाता था और 5 से 8 वर्ष की आयु में सभी बच्चों को गुरुकुल भेज दिया जाता था क्योंकि उस समय बालक को ना सिर्फ किताबी ज्ञान  , बल्कि  धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और वैज्ञानिक ज्ञान भी दिया जाता था। परंतु आज के आधुनिक युग में आधुनिक शिक्षा के नाम पर स्कूलों में सिर्फ किताबी ज्ञान ही दिया जाता है क्योंकि लक्ष्य अंक प्राप्त करना है, रैंक प्राप्त करना है । और अंक ही हमारे जीवन का भविष्य निर्धारित करते हैं । अंक नहीं तो जीवन की कोई सुंदर कल्पना भी नहीं । परंतु इस अंकों की दौड़ में कहीं ना कहीं संस्कार पीछे छूटते जा रहे हैं । लोगों का सामाजिक मनोबल का स्तर  गिरता जा रहा है  । तभी तो जरा सी मुसीबत आती नहीं कि लोग हार मान जाते हैं और बड़े से बड़े बिजनेसमैन, बड़े से बड़े कलाकार या बहुत बड़े प्रतिष्ठित व्यक्ति  को हम सुसाइड करने वाली खबरों में पाते हैं । क्योंकि उन्होंने सिर्फ एक ही क्षेत्र में कामयाबी प्राप्त की है , अंक प्राप्त किए हैं -आर्थिक  , सामाजिक , राजनीतिक क्षेत्र में और जीवन के ओर भी बहुत सारे पड़ाव जिनका मनुष्य से हमेशा आमना सामना होता रहता है,  इनकी शिक्षा - दीक्षा तो उन्हें मिली ही नहीं ।  ऐसा नहीं है कि इन क्षेत्रों को बिल्कुल भी स्पर्श नहीं किया जाता , लाइफ स्किल्स के नाम पर बहुत सारी वर्कशॉप्स होती हैं । टीचर्स को ट्रेनिंग दी जाती है कि आप बच्चों को यह सब कुछ सिखाएं लेकिन उसके लिए व्यवस्था करनी पड़ेगी , उसके लिए प्रारूप बनाना पड़ेगा,  उसके लिए समय निकालना पड़ेगा जो कि संभव नहीं है । क्योंकि इसके लिए ना तो माता-पिता अपने बच्चों को समय निकाल कर देते हैं और ना ही शिक्षक ऐसा कर सकता है क्योंकि सभी   का ध्यान सिलेबस पूरा करना और अंकों को हासिल करना होता है । साल में 6 महीने में अगर आप ऐसे 4 बार भी वर्कशॉप लगा देते हैं तो यह पर्याप्त नहीं है ।  इसके लिए गुरुकुलीय शिक्षा ही महत्वपूर्ण है जो मनुष्य का संपूर्ण निर्माण करती है । यह आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और बच्चों के रुचि के अनुसार  उनका निर्माण करती है । 
जो आदर गुरु को मिलता था वह आदर कहीं पीछे छूटता जा रहा है ऐसा नहीं है कि आज के समय में गुरु उच्च स्तर के नहीं हैं , बच्चों को आगे लेकर नहीं जाना चाहते अपितु गुरु आज भी उसी उच्च स्तर पर विराजमान हैं, वे हर  वो कोशिश करते हैं कि बच्चों का भविष्य उज्जवल हो और उसके लिए मेहनत भी करते हैं । परंतु इतना कुछ करने के बावजूद भी गुरु को वह सम्मान नहीं मिलता जिसके वह अधिकारी हैं। ऐसा लगता है कि गुरु की स्वतंत्रता जैसे उनसे छीन ली गई हो ।
एक कहावत है 
 हीरे को जितना तराशा जाता है उतना ही उसका मूल्य बढ़ जाता है   ।

परंतु आज के हीरों को तराशने का किसी भी शिक्षक को अधिकार नहीं है। बच्चों में सुधार के लिए शिक्षक अगर थोड़ी भी कठोरता से व्यवहार करते हैं तो सबसे पहले शिकायत तो माता पिता को ही होती है क्योंकि वह बच्चों को बड़े लाड प्यार से रखते हैं और इसीलिए नहीं चाहते कि बच्चों को डांटा जाए । बच्चों के लाड़ प्यार में उनकी वे हर उस जिद्द को भी पूरी करते है जो नहीं करनी चाहिए । इसको छोटे- छोटे से कुछ उदाहरणों से स्पष्ट करना चाहूंगी -
जैसे आज के इस आधुनिक युग में ज्यादातर माता-पिता की शिकायत होती है कि बच्चे कहना नहीं मानते , सारा दिन फोन देखते रहते हैं , गेम्स खेलते हैं , टीवी देखते रहते हैं , पढ़ाई नहीं करते,  समय पर खाना नहीं खाते , बड़ों का आदर नहीं करते इत्यादि । एक शिक्षिका होने के नाते माता-पिता की ये शिकायतें सुनकर मन में प्रश्न आता है कि बच्चे को ये सब समझाने का दायित्व किस का बनता है ?? और अगर माता-पिता ही समझा नहीं पा रहे तो इसमें दोष किसका है ??? आप दो या तीन बच्चों को या फिर एक ही बच्चे के माता-पिता होकर उसको समझा नहीं पा रहे उसको सही- गलत नहीं बता पा रहे हो और आप उम्मीद करते हैं कि एक शिक्षक जो 40 से 50 बच्चों के समूह को 40 मिनट पढ़ाता है , वह उसको  सब कुछ सिखा पाएगा । ऐसे कैसे संभव हो सकता है ? स्वयं विचार कीजिए........

इसके लिए एक शिक्षक को समय चाहिए तभी वह कुछ कर पाएगा और समय तभी दे पाएंगे जब गुरुकुल शिक्षा को बढ़ावा देंगे क्योंकि गुरुकुल में ही शिक्षक अपने शिष्यों के साथ रहकर उनको भली प्रकार समझ पाता है और उनका निर्माण अच्छे से कर पाता है। स्कूल में मात्र 6 घंटे शिक्षकों के पास बच्चा रहता है और उनमें से भी हर शिक्षक के पास 40-40 मिनट तो ऐसे में ये बदलाव कैसे आ पाएंगे।  परंतु आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगी कि इतने कम समय में भी शिक्षक आपके बच्चों को वो बातें सिखा देता है जो आप स्वयं नहीं सिखा पाते ।  तो थोड़ा विचार कर शिक्षक को स्वतंत्र रूप से अपने शिष्यों को पढ़ाने का, सिखाने का अवसर तो दीजिए , गुरुकुल की शिक्षा की तरफ एक कदम तो बढ़ाइए। यकीन मानिए ऐसा करने से आपका और आपके बच्चे का विकास तो  होगा ही और वह भी सकारात्मक विकास । जिसको वास्तव में ओवरऑल डेवलपमेंट की परिभाषा दी जा सकती है।  आज के इस दौर में बहुत सारे ऐसे गुरुकुल देखने को भी मिलने लगे हैं  तो आइए वैदिक परंपरा की ओर लौटें ।
 आप सभी को  शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं  ।


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