शिक्षक की डांट-फटकार का महत्व क्या है ???

आज मैं अपनी ब्लॉग motivationalhub01blogspot.com के माध्यम से आप सभी को बताना चाहती हूं :- शिक्षक की डांट-फटकार का महत्व क्या है 

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 हम सभी ने अपने किसी अध्यापक या अध्यापिका से किसी किसी अवसर पर मार अवश्य खाई होती है  । कुछ विद्यार्थी तो  प्रतिदिन  मार खाते हैं , उनको इस बात का न तो बुरा  लगता है और न ही वो सुधरते हैं।   परंतु कुछ विद्यार्थी ऐसे होते हैं कि शिक्षक डांट भी दे तो उससे ही उनको अपमान महसूस होता है तथा कुछ विद्यार्थी ऐसे होते हैं कि अपने शिक्षक को डांटने का अवसर ही नहीं देते अर्थात उनका हर काम पूर्ण होता है चाहे वह पढ़ने का हो, लिखने का हो ,याद करने का हो या कुछ और।  प्रत्येक काम को शिक्षक के कहते ही पूरा कर देते हैं ।  आजकल ऐसा माहौल देखने को नहीं मिलता , अगर है मिलता भी है तो बहुत कम ।  परंतु शिक्षक की  सही समय पर डांट या उनका एक आध थप्पड़   विद्यार्थीयों के लिए वरदान का काम करते हैं । आइए , समझते हैं कैसे….???

बात उन दिनों की है जब मैं कक्षा 6 वीं की छात्रा थी । हमारी गणित की अध्यापिका ने यूनिट  टैस्ट लेने के लिए एक तारिख तय कर हमें बता दी थी ।  सभी विद्यार्थी कक्षा परिक्षा की  तैयारी करने लगे । अब  परीक्षा का दिन भी आ गया । हमारी अध्यापिका ने हर एक्सरसाइज में से कुछ ना कुछ सवाल दिए और कुछ अपनी तरफ से भी डाल दिए।   अब सभी विद्यार्थी एक दूसरे की तरफ देखने  लगे । इसी दौरान  गणित की अध्यापिका को किसी कारणवश ऑफिस में बुला लिया गया  ।  उन दिनों मॉनिटर  ही शिक्षक की अनुपस्थिति में कक्षा को संभालते थे । इसीलिए मॉनिटर की ड्यूटी लगी कि किसी को नक़ल नहीं करनी देनी और ना ही बोलने देना । मॉनिटर भी बड़े शिक्षक भक्त होते थे।  मित्रता शिक्षक - शिष्य  के आड़े नहीं आती थी । मॉनिटर बड़ी ईमानदारी से जो भी दोषी होता था उसका नाम अपनी नोटबुक में लिख कर अध्यापिका  को  दिखा देती थी । परंतु उस दिन का दृश्य कुछ ओर ही था क्योंकि यूनिट टेस्ट था तो विद्यार्थियों ने मॉनिटर से गुहार लगाई कि वह उनको सवाल बता दें क्योंकि उनको  आते  नहीं थे । उन्होंने मित्रता का वास्ता दिया और भी कुछ लालच दिए तो अब ऐसे में मॉनिटर को लालच  आ गया और उसने पूरी कक्षा को  नक़ल करवा  दी ।  10 मिनट बाद शिक्षिका वापस आईं तो उन्होंने देखा  कि सारे बच्चों ने टेस्ट कर लिया । वो हैरान तो हुई कि ऐसा कैसे संभव है ? एक शिक्षक को अपने विद्यार्थियों का अनुमान होता है कि कौन कितने पानी में है । उन्होंने मॉनिटर को कहा जाओ शहतूत के पेड़ से एक पतला सा डंडा तोड़ के लाओ । मॉनिटर मन ही मन फूली न समा् रही थी क्योंकि उसको तो डंडे लगने का सवाल ही नहीं था तो वह बड़ी खुशी से जाती है डंडा लेने और डंडा लाकर अपनी शिक्षिका को दे देती है।  अब शिक्षिका मॉनिटर से पूछती है  :- क्या तुमने चीटिंग करवाई ? शिक्षिका के ऐसे पूछने पर मॉनिटर जवाब नहीं दे पाई और चुप खड़ी हो गई क्योंकि  चिटिंग तो करवाई थी । शिक्षिका सबसे पहले उस पतले-से डंडा  से माॅनिटर के छोटे-छोटे कोमल हाथों पर जोर से मारा , दोनों हाथों पर बस एक-एक ।  परंतु एक प्रहार से ही हाथ सुर्ख लाल हो  गया  तथा सूजन भी आ गई ।  उसके बाद शिक्षिका कहती है :- "आज के बाद शायद तुम सारे काम ईमानदारी  से करोगी । आशा करती हूं  जीवन के इस पाठ के लिए तुम्हें दोबारा समझाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। "  वास्तव में ये दो डंडे ईमानदारी का पाठ पढ़ाने में सफल रहे ।  उस दिन के बाद  मानिटर जी ठान लेती हैं कि ना तो झूठ बोलना है ना ही चोरी करनी है और कोई देखे ना देखे प्रत्येक काम ईमानदारी से करना है। 

 इस घटनाक्रम को दो साल बित चुके थे और वो मानिटर भी आठवीं  कक्षा में हो गई थी । उन दिनों  आठवीं में भी बोर्ड की परीक्षा होती थी । नक़ल करवाने का चलन भी बहुत था ।  बोर्ड की परीक्षा में, जो बच्चे नालायक होते थे उनके माता पिता या भाई बहन या दोस्त छोटी-छोटी चिप्स बना करके उनके रूम में  बने रोशनदान से अंदर फेंक देते थे  ।  मानिटर वाली कक्षा में जितनी भी पर्चियां उसके आस पास आकर गिरी वो सारी उठाकर निरिक्षक को थमा देती थी । हालांकि इसके नुकसान के रूप उसे दूसरे विद्यार्थियों की बहुत बातें सुननी पड़ी । सच्चाई और ईमानदारी के रास्ते पर चलना थोड़ा मुश्किल होता है परंतु इसमें ही वास्तविक आनंद छिपा होता है । ये बात इस बच्चे को अच्छे से समझ आ गई थी इसलिए किसी की परवाह नहीं थी । गणित अध्यापिका ने सजा देते हुए जो परिकल्पना की थी वो सार्थक सिद्ध हो चुकी थी और उन्हें भी अपनी ऐसी शिष्या पर गर्व हो रहा था। 

 शिक्षक की डांट फटकार को आशीर्वाद समझने वाले  शिष्य महान व्यक्तित्व के रूप में उभरकर आते हैं । वे अपने देश व समाज के लिए कुछ विशेष कार्य कर पाते हैं  महाराणा प्रताप ऐसे ही शिष्य थे । हमें सदैव शिक्षक का सम्मान करना चाहिए क्योंकि माता-पिता के बाद बच्चे हितैषी शिक्षक ही होते हैं । 

 

Comments

  1. यह कहानी में कौन हैं जी क्या आप मॉनिटर थी या मेडम कृपा प्रकाश डाले

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