भविष्य निर्माता कौन???

 भविष्य निर्माता कौन ???
आज मैं आपको अपने motivationalhub blogspot.com के माध्यम से एक ओर ऐसे शिक्षक का  परिचय कराना चाहती हूं जो इस बात को साबित करता है कि शिक्षक ही राष्ट्र निर्माता है । वह वर्तमान  को सुधारता है और भविष्य निर्माता है। 
 19वीं शताब्दी की  बात है जब डिजिटल ज्ञान से किसी का कोई वास्ता नहीं था । फोन करने के लिए भी STD का प्रयोग किया जाता था । और बेसिक टेलीफोन बात करने के लिए प्रयोग किये जाते थे।  परंतु इस सुविधा के ना होते हुए भी एक शिक्षक, समाज के बिखरे हुए मोतियों को एक सूत्र में पिरोने का काम बड़ी आसानी से कर देते थे । आज के समय में कोटा को प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए एक बहुत बड़ा हब माना जाता है और  मैं आज के इस ब्लॉग में , कोटा से जुड़े एक शिक्षक का परिचय  कराना चाहती हूं -- कैसे उन्होंने सामाजिक भेदभाव को दूर करते हुए सबको एक सूत्र में पिरोने का काम किया था । कोटा के अंता में एक छोटा सा प्राइवेट स्कूल हुआ करता था । परंतु यह स्कूल बहुत लोकप्रिय था। कोटा रेजिमेंट में काम करने वाले सैनिकों के बच्चे इसी स्कूल में पढ़ते थे।  इस स्कूल की दो शाखाएं थी एक शहर के बीचों-बीच और एक उसकी बाहरी सीमा पर । जो स्कूल बाहरी सीमा पर था उसके प्रधानाचार्य बहुत ही उदार दिल के व्यक्ति थे। वह सभी को एक सूत्र में पिरोने का काम करते थे कोई भी छोटी या बड़ी समस्या हो उस को सुलझाने में वह सदैव आगे रहते थे । स्कूल में अलग-अलग समुदायों से बच्चे आते थे और अलग-अलग प्रदेश और प्रांत से भी  तथा सैनिकों के बच्चे   भी यहां पढ़ते थे। 1 दिन उस स्कूल में दूसरी कक्षा में एक विद्यार्थी का दाखिला कराने हरियाणा से एक व्यक्ति आता है और प्रवेश परीक्षा के उपरांत उस बच्चे का दाखिला  स्कूल में हो जाता है । जब एक बच्चा नए परिवेश में जाता है तो  उसके लिए सबके साथ सामंजस्य बैठाना बहुत मुश्किल कार्य होता है । वह अपने मित्र भी नहीं बना पाता और ना ही किसी के साथ खुलकर बातचीत कर पाता है ऐसे में उस बच्चे को संभालने  का दायित्व एक शिक्षक के लिए ओर भी ज्यादा बढ़ जाता है । माता पिता के उपरांत विद्यार्थी अपने शिक्षक पर ही भरोसा करता है । परंतु अपवाद रूप में कभी-कभी शिक्षक भी अच्छे नहीं मिलते या हम कह सकते हैं की सामाजिक परिवेश के अनुरूप कोई एकाध शिक्षक कुंठा ग्रस्त होते हैं ऐसे में वह उस नए परिवेश में आए विद्यार्थी को संभालने की बजाय उसका उपहास करते हैं या उसकी तरफ ध्यान नहीं देते। ऐसा ही कुछ उस विद्यार्थी के साथ हुआ । वह ना तो अभी अपने दोस्त बना पाया था ना ही शिक्षक के ऊपर भरोसा कर पा रहा था और पढ़ाई-लिखाई में भी असुविधा का सामना करना पड़ रहा था क्योंकि पाठ्यक्रम में बदलाव था तथा कुछेक अध्याय पहले ही समाप्त हो चुके थे। ऐसे में वह विद्यार्थी तीन-चार दिन से लंच ब्रेक में बैठकर रोता रहता था । कक्षा के दूसरे विद्यार्थी मदद करने की बजाय उस विद्यार्थी से कन्नी काट चुके थे अर्थात साफ साफ शब्दों में कह चुके थे की हम तुम्हारे साथ दोस्ती नहीं करेंगे । इस बात में कक्षा इंचार्ज भी पुराने बच्चों के साथ थे । कहने का तात्पर्य है कि वह बच्चों को समझाने की बजाय उनके साथ मिलकर नए विद्यार्थी का उपहास कर रहे थे ।  इसी दौरान प्रधानाचार्य जी निरीक्षण  / दौरे पर थे । माहौल को देखकर वह समझ जाते हैं की कुछ समस्या है अतः वह कक्षा में प्रवेश करते हैं और वहां पर उपस्थित बच्चों और कक्षा इंचार्ज से कारण जानने का प्रयास करते हैं। परंतु कक्षा इंचार्ज और विद्यार्थी सीधी बात ना बोल कर सब कुछ गोलमोल कर देते हैं। वह सारे बहाने बनाते हैं और कहते हैं -- "नए परिवेश में यह विद्यार्थी स्वयं को एडजस्ट नहीं कर पा रहा। " ऐसे में प्रधानाचार्य पिता तुल्य सोचते हैं , विचार करते हैं और उस बच्चे को गोद में उठाकर स्कूल की कक्षाएं दिखाते हुए उसे स्कूल के खेल के मैदान में ले जाते हैं जहां पर 2 क्लास खेल रही थी। गोद में लिए हुए उस नए विद्यार्थी को पुचकारते हुए उसे भी खेलने का आग्रह करते हैं परंतु वह विद्यार्थी अभी खेलने के लिए तैयार नहीं था । प्रधानाचार्य जी वापिस दूसरी कक्षा में आते हैं और उस विद्यार्थी का लंच बॉक्स लेते हैं तथा उसे अपने ऑफिस में ले जाकर एक आया को आदेश देते हैं कि इस विद्यार्थी को खाना खिलायें।  शेष बचे दिन वह विद्यार्थी ऑफिस में रखी ट्रॉफीयों के साथ बैठा हुआ खेलता रहा । छुट्टी के समय बस कंडक्टर आकर उस विद्यार्थी को ले जाता है । अगले दिन सुबह वह विद्यार्थी फिर से आते ही ऑफिस पर अपना हक जमा लेता है परंतु प्रधानाचार्य को इस बात से कोई एतराज नहीं था ।  बच्चे का मन आता तो वह पढ़ता नहीं तो एक्टिविटी रूम में खेलता और ऑफिस में ही सोफे पर सो जाता अब धीरे-धीरे बहला-फुसलाकर प्रधानाचार्य   जी उस विद्यार्थी को उसकी कक्षा में छोड़ आए और  उन्होंने  पुराने विद्यार्थियों को निर्देश दिया कि सभी मिलकर नए विद्यार्थी का स्वागत करें और उसे ने परिवेश में ढलने में सहायक बनें तथा इसके साथ ही  मिलकर लंच ब्रेक में लंच करें ।इस दिन के बाद सब कुछ परिवर्तित हो गया यहां तक कि कक्षा इंचार्ज  भी नए विद्यार्थी के साथ घुल-मिल गए थे ।  वह ये  सब परिवर्तन देखकर खुश था उसे इस बात का आभास नहीं था कि ऐसे क्यों हुआ .... उसको सब अपने लगने लगे थे परन्तु प्रधानाचार्य जी से कुछ विशेष लगाव हो गया था ।
उपरोक्त बातों से पता चलता है कि शिक्षक  न  केवल एक दीपक की तरह जलकर प्रकाश  फैलाता  है  बल्कि उसके शिष्यों में सूरज बनने की क्षमता भी उत्पन्न करता है  । 
 

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