गणेश चतुर्थी ; गणेश चतुर्थी क्यों और कैसे मनाएं

गणेश चतुर्थी एक ऐसा पर्व है जिसको देश के प्रत्येक कोने में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है सभी लोग गणेश की  कुछ दिनों तक पूजा करते हैं और फिर  उनका विसर्जन कर देते हैं । 

 भारतीय परंपराओं के पीछे कोई न कोई कारण छिपा होता है जिस को लागू करने के लिए हमारे पूर्वजों ने  कोई ना कोई प्रतीकात्मक रूप दे दिया या पूजा का रूप दे दिया।  जैसे कि नवरात्रों में 9 दिन उपवास किया जाता है और हर छह महीने बाद यह क्रम दोहराया जाता है ताकि स्वास्थ्य में सुधार आ सके क्योंकि नवरात्रों के  समय मौसम परिवर्तन के दिन होते हैं और इन दिनों में बीमारियां ज्यादा पनपती हैं इसलिए अच्छा स्वास्थ्य पाने के लिए  9 दिनों के व्रत की परंपरा शुरू की गई होगी। 

इसी तरह गणेश की पूजा भी हमें बहुत सारी सीख देती है । सबसे पहले तो अगर हम बात करें तो ईश्वर, परमपिता परमात्मा सब जगह विद्यमान है और उनको कई नामों से अलग-अलग जगह पर जाना जाता है परमात्मा के इन नामों में से एक नाम गणेश भी है जिसका अर्थ है :- गणों का ईश  । 
  भगवान गणेश के रूप की व्याख्या करते हुए गया है कि गणेश का मस्तक हाथी का मस्तक है , उनके कान बड़े बड़े हैं , वह लंबोदर के नाम से भी जाने जाते हैं, मोदक का भोग लगाते हैं और मूषक सवारी करते हैं  । ये सारे प्रतीक के रूप में प्रयोग किए गए हैं । जैसे किसी भी कविता या किसी भी लेख को लिखने के लिए अलंकारों ,  रसों , प्रतीकों का प्रयोग किया जाता है उसी तरह से गणेश के रूप का व्याख्यान करते हुए उपरोक्त प्रतीकों का प्रयोग किया गया है।   हमारे पूर्वज, ऋषि मुनि हमें इन प्रतीकों के माध्यम से समझाना चाहते थे कि समाज को दिशा निर्देश देने वाले व्यक्ति का जीवन  कैसा होना चाहिए । आइए जानते हैं इन प्रतीकों का अर्थ क्या है :-
हाथी सा मस्तक यानि बड़ा सिर जो सूझ-बूझ से काम लेता हो । जो सोच समझ कर कार्य करता हो । जो सभी को उच्च दर्जे का स्थान  अथवा सम्मान देता हो  । बड़े-बड़े कान  सत्य , श्रेष्ठ वचन  सुनने को ही प्राथमिकता देते हैं  पक्ष और विपक्ष की बातें धैर्य से सुनने के पश्चात निर्णय लेने के लिए प्रेरित करते हैं । छोटी छोटी आंखें सूक्ष्मदर्शी होती हैं । सूंड सी नाक स्वाभिमान को दर्शाती हैं  जो किसी भी अच्छी बुरी हलचल को तुरंत भांप लेती है । सभी की बातों को अपने तक ही सीमित रखना और सही समय से पहले कोई सलाह  न देना लंबोदर के लक्षण हैं ।  चार भुजाएं अर्थात चारों वेद का ज्ञाता हैं ।  इनकी  चूहे की सवारी अर्थात चूहे जैसे चतुर, चुपके से अपना काम कर जाने वाले व्यक्तित्व से भी दोस्ती होती है  क्योंकि ऐसे व्यक्ति राष्ट्रीय सुरक्षा में अहम भूमिका निभा सकते हैं  । अतः हम सबको भी इन गुणों को धारण करने की प्रेरणा  लेनी चाहिए और वेद मार्ग पर बढ़ते रहना चाहिए ।

जन्माष्टमी पर विशेष :-
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