यम और नचिकेता के इस संवाद में मनुष्य को आत्मा और परमात्मा का बोध तो करवाया ही गया है साथ ही आत्मसाक्षात्कार और परमात्मसाक्षातकर कैसे हो संभव है.... इसकी भी व्याख्या की गई है।
जब नचिकेता अपनी बात पर अडिग रहा तो आचार्य ने उसके समक्ष ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया ।
श्रेय और प्रेय यह दोनों भिन्न मार्ग है। दोनों परस्पर विरोधी हैं जिन्हें विद्या और अविद्या के नाम से भी जाना जाता है , जो मनुष्य को अपनी ओर आकृष्ट करते हैं श्रेय मार्ग लोकोत्तर कल्याण का मार्ग है जबकि प्रेय मार्ग संसार में बांधने वाला तथा मनुष्य को आध्यात्मिक लक्ष्य से हटाने वाला मार्ग है ।
हे नचिकेता! तुमने श्रेष्ठ मार्ग अपनाया है । आत्मज्ञान दुर्लभ वस्तु है, बहुतों को तो यह ज्ञान सुनने को भी नहीं मिलता जिन्हें सुनने का अवसर मिलता है वे भी इसे भली प्रकार नहीं जानते । आत्मज्ञान का जानकार तो कोई विरला ही होता है, इसे प्राप्त करने वाला भी कोई विरला पुरुष ही होता है। आत्मा का उपदेश और चिंतन बहुत लोग करते हैं ।
आत्मा अणु से भी सूक्ष्म है । परमात्मा की भांति यह आत्मा भी अमर , शाश्वत, नित्य और अजन्मा है। इसका न कभी जन्म होता है और न ही मृत्यु । शरीर के नष्ट हो जाने पर जीवात्मा नष्ट नहीं होता , आत्मा ना मरता है और ना ही मारा जाता है आत्मा अणु से भी सूक्ष्म और महान से भी महान है । यह प्राणी के हृदयाकाश में स्थित रहता है । आत्मा की शक्तियां दिव्य है। व्यक्ति एक स्थान पर बैठा हुआ भी आत्मिक शक्ति के बल पर दूर तक पहुंच जाता है। सुप्तावस्था में भी आत्मिक शक्ति ही उसे सर्वत्र भ्रमण कराती है।
मनुष्य का यह शरीर रथ है और जीवात्मा उसके स्वामी के रूप में रथासीन है, बुद्धि सारथी के समान है मन की लगाम को बुद्धि रुपी सारथी से नियंत्रित करना पड़ता है । इन्द्रियां घोड़ों की भांति शरीर रूपी रथ को जीवनयात्रा पर दौड़ाती हैं । इन सबसे सूक्ष्म है चेतन जीव और ब्रह्म । परमात्मा से सूक्ष्म कुछ ओर नहीं है वहीं जीव की अन्तिम गति है । अतः परमात्मा के दर्शन, आत्मसाक्षात्कार के बाद ही संभव है ।
अतः मनुष्य को अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए , श्रेय मार्ग पर चलते हुए निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए ।
Comments
Post a Comment
https://motivationalhub01.blogspot.com/?m=1