गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वर:गुरु साक्षात् परम्ब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः।।
मनुष्य के जीवन में गुरु की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण होती है। गुरु के बिना मनुष्य कुछ भी नहीं सीख पाता और एक मनुष्य पशु में तब्दील हो जाता है। पैदा होने से मरणोपरांत तक मनुष्य किसी न किसी रूप में बहुत कुछ सीखता रहता है। और वह जो भी सीखता है वह एक गुरु से सीखता है । सबसे पहले गुरु का दर्जा माता-पिता को मिलता है उसके बाद समाज और शिक्षक को मिलता है। माता-पिता बनते ही उनके ऊपर एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी आ जाती है । वेदों के अनुरूप व्यवस्था का अगर पालन किया जाए तो उसके अनुसार मनुष्य को माता-पिता बनने से पहले ही उस दायित्व को समझ लेना चाहिए । माता पिता का कर्तव्य सिर्फ बच्चों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना ही नहीं बल्कि विवेक, स्वास्थ्य, संस्कारों से भी मजबूत बनाना होता है ।
आज के आधुनिक दौर कि अगर हम बात करें तो इस समय में माता और पिता दोनों ही घर और बाहर के कार्यों को संभालते हैं, ऑफिस में जाते हैं, अपना अपना काम करते हैं, छोटे-बड़े पदों पर कार्यरत हैं। आज के समय में कंपटीशन इतना बढ़ गया है कि बच्चों को हम अच्छे से अच्छे स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं , अच्छे से अच्छे ट्यूशन दिलवाना चाहते हैं क्योंकि नौकरी पाने के लिए एक बहुत बड़े स्तर को पास करना पड़ता है। माता पिता इस कर्तव्य को बखूबी निभा रहे हैं । परंतु संस्कारों की तरफ ना तो स्कूल का ध्यान है और ना ही माता-पिता का। क्योंकि इतना समय ही नहीं है किसी के पास। सभी को बस सिलेबस कराना है क्योंकि अगर सिलेबस नहीं करवाया जाएगा तो बच्चे के किताबी ज्ञान को कैसे बढ़ाया जाएगा ?? और ज्ञान बढ़ेगा तभी तो बच्चा नंबर लेकर आएगा; नंबर आएंगे तो ही बच्चा किसी अच्छे पद पर कार्यरत हो सकेगा । रही सही कसर कोरोनावायरस के काल में पूरी हो गई क्योंकि ऑनलाइन शिक्षा के नाम पर हर बच्चे को फोन की सुविधा दी गई । फोन को चलाने के लिए परिपक्वता का होना जरूरी है । जो बच्चे अभी परिपक्व ही नहीं हुई वो फोन में अपनी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं या गेम्स खेल रहे हैं या फिर कुछ और चला रहे हैं इसकी भनक तो तब लगती है जब पानी सर से ऊपर निकल जाता है । अखबारों में खबरों में रोज इस तरह की समस्याएं देखने को मिलती है कि बच्चे ने गेम के कारण अपनी जान गवां दी है। या फिर बच्चा स्कूल की क्लास लगाने की बजाए इंटरनेट के माध्यम से कुछ और ही देख रहा है । अगर मां-बाप घर में है तो कुछ हद तक इस समस्या का समाधान हो सकता है क्योंकि वे बार-बार अपने बच्चे को बीच-बीच में देखते रहते हैं, उन पर नजर बनाए रखते हैं , परंतु यदि माता-पिता दोनों ही कार्यरत हैं ,तो पीछे से बच्चे को देखेगा कौन ?? अब तो बच्चा स्वयं का मालिक है वह चाहे जो मर्जी करे और समझ, परिपक्वता अभी उसमें है नहीं कि उसका उपयोग करते हुए फोन को चलाए , अपनी शिक्षा को ग्रहण करे । अध्यापक फोन पर पढ़ाते हैं तो बच्चों की गतिविधियों के ऊपर नजर नहीं रख पाते । ऐसे में इस समस्या से निपटा कैसे जाए ?
इसको सुलझाने का एकमात्र तरीका है कि माता-पिता बच्चों के मित्र एवं सहयोगी बन जाएं । उनको मानसिक तौर पर मजबूत बनाएं। उनको बैठ कर समझाएं कि स्थिति के हिसाब से स्वयं को कैसे ढालें । माता-पिता को भी एक उदाहरण के तौर पर अपना जीवन उनके सामने प्रस्तुत करना होगा। कोई नियम घर में बना है तो उस नियम का बड़े जिस तरह से पालन करते हैं इस चीज को बच्चे बड़ी गहराई के साथ देखते हैं और समझते हैं अतः जो नियम घर में बनाए हैं उनका पालन करने में बड़े पहल करें तो बच्चा स्वयं ही उन नियमों का पालन करने लग जायेगा । बच्चों को महापुरुषों की कहानियां सुनाएं , उनका मनोबल बढ़ाएं । एक दिन में कोई बदलाव नहीं आता परंतु बदलाव की शुरुआत हो जाती है । निरंतर एवं सही दिशा में प्रयास करते रहने से ही जीत संभव होती है ।
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