सच्चे अर्थों में कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव

 चित्र नहीं चरित्र की पूजा करो 
भोगी नहीं , योगी बनो 
कृष्ण के सच्चे अनुयायी बनो ।।

भारत एक ऐसा गौरवमय देश रहा है जहां पर बड़े-बड़े महापुरुष  , योगी , तपस्वी हुए हैं जिन्होंने तप करके बहुत सारी सिद्धियां प्राप्त की हैं और उन सिद्धियों के बलबूते लोगों  की ,  समाज की और देश की भलाई करने का काम किया है; मानव मात्र के कल्याण का काम किया है ।
ऐसे ही एक महापुरुष हमारे देश में हुए हैं , जिनका जन्मदिन कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में बड़े धूमधाम के साथ मनाया जाता है।

 कृष्ण एक ऐसे योगी पुरुष , योद्धा  और विद्वान थे कि युद्ध की विभीषिका से बचाने के लिए अपनी प्रजा को द्वारिका में ले जाते हैं और वहां पर एक नया नगर बसाते हैं । कृष्ण ने  अपने विवेक से बहुत सारे राक्षसों का  अर्थात बुरी मानवीय वृतियों का सर्वनाश किया था। उन्होंने कंस का वध कर बहुत सारे लोगों के दुखों का निवारण किया था  ।  शिशुपाल को सुधरने का  बार बार अवसर दिया और चेतावनी देकर समझाने का प्रयत्न किया परंतु जब उसके अपराधों में जब  कोई कमी आई  तब जाकर कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उसका वध किया था । अर्थात वह दोषियों को पहले समझा कर उसको सुधारने का प्रयत्न करते थे और जब समझाने बुझाने से कोई काम ना चलता था तो वह उसको दंड देते थे ।ऐसा ही उदाहरण हम महाभारत में भी देख सकते हैं जब वह दुर्योधन को बार-बार समझाने का प्रयास करते हैं परंतु  दुर्योधन जब नहीं समझता तो धर्म की रक्षा के लिए अंतिम रास्ता युद्ध  ही बचता है, जिसे वे विवश होकर अपनाते हैं  । कंस का वध करने के बाद भी वह सिंहासन पर खुद ना बैठ कर अपने नाना उग्रसेन को राजगद्दी  सौंप देते हैं, उनको वहां का राजा बना देते हैं । हम कह सकते हैं कि उनको  राजसिंहासन का कोई लोभ नहीं था ।
 श्री कृष्ण को भगवान माना जाता है उनकी पूजा की जाती है और पूजा ऐसे व्यक्तित्व की की जाती है जिसके अंदर कोई दोष ना हो , जिसका अनुसरण किया जा सके , जो सदैव लोगों का पालन-पोषण करता हो, जो ऐश्वर्यवान हो । सत्य तो यही है कि भगवान कृष्ण के चरित्र में कोई दोष नहीं था । महाभारत  में ऐसी कोई घटना का वर्णन नहीं मिलता कि उनके चरित्र पर कोई दोषारोपण किया जा सके । हम सभी को पता है कि कर्ण की माता का नाम राधा था इसीलिए उसे राधेय कहा जाता था । राधा का चरित्र महाभारत में कर्ण की मां के रूप में ही सुनने , देखने व  पढ़ने को मिलता है ।  कृष्ण की एकमात्र पत्नी  रुकमणी थी तो फिर यह राधा का नाम हमारे इतिहास में कहां से आया जिसको कृष्ण के नाम के साथ जोड़ दिया गया ???   भागवत पुराण में भी किसी ओर राधा का नाम नहीं है । यह  नाम ब्रह्मवैवर्त पुराण से आया है । इस पुराण में राधा के कृष्ण के साथ अलग-अलग खंडों में अलग-अलग संबंध दर्शाए गए हैं अतः इस पर स्वत: ही संदेह हो जाता है ।  इस पुराण के ब्रह्मखंड- अध्याय पांच के 25वें-26वें म श्लोक में राधा ,श्री कृष्ण के वामपाशर्व  से उत्पन्न हुई अतः इस नाते राधा को श्रीकृष्ण की पुत्री बताया गया है। प्रकृति खंड -अध्याय 48 के अनुसार राधा को कृष्ण की प्रमिका  बताया गया है। इसी पुराण के प्रकृति खंड -अध्याय 49  के  35,36,37,40,47 श्लोकों के अनुसार राधा श्री कृष्ण की मामी के रूप में अस्तित्व में प्रस्तुत की गई हैं क्योंकि उसका विवाह कृष्ण की माता यशोदा के भाई रायण के साथ हुआ था ।  अतः इस पुराण में राधा की स्थिति स्पष्ट नहीं  है।  इसीलिए हम सबको
 इस तथ्य के बारे में अध्ययन करने की और गहन चिंतन  करने की आवश्यकता है । योग हमें अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण करना सिखाता है।  योगीराज कृष्ण तो थे ही एक महान योगी , एक सिद्ध महापुरुष ।  उनके चरित्र पर किसी को छेड़ने ,  परेशान करने , गोपियों की मटकी फोड़ने , गोपियों के वस्त्र चुराने  और माखन चुराकर खाने का लांछन लगाना  अति निंदनीय है ।  तार्किक दृष्टिकण का प्रयोग करते हुए
 हमें जन्माष्टमी के पर्व को  सच्चा अर्थ जानते हुए बड़ी धूमधाम के साथ मनाना चाहिए । और ध्यान रखना चाहिए कि एक सभ्य  संस्कृति उभरकर हमारे आने वाली पीढ़ी के सामने चित्रित की जा सके।  और साथ ही हमें प्रण लेना चाहिए कि हम भी श्रीकृष्ण जैसा बनने का प्रयास करें ।

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